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राहत भरा रहा फॉरेस्ट फायर सीजन का डेढ़ महीना, गढ़वाल में हुई वनाग्नि की अधिकतर घटनाएं


उत्तराखंड फॉरेस्ट फायर सीजन (Photo-ETV Bharat)

देहरादून: उत्तराखंड में फॉरेस्ट फायर सीजन 2026 का शुरुआती डेढ़ महीना राहत भरा साबित हुआ है. हर साल की तरह इस बार भी जंगलों में आग लगने की आशंका जताई जा रही थी, लेकिन अब तक सामने आए आंकड़े अपेक्षाकृत कम घटनाओं की ओर इशारा कर रहे हैं. हालांकि जो भी घटनाएं हुई हैं, उनमें से 90 प्रतिशत से अधिक मामले गढ़वाल मंडल से सामने आए हैं.

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में वनाग्नि लंबे समय से एक गंभीर समस्या रही है. गर्मियों के मौसम में तापमान बढ़ने, सूखी पत्तियों और तेज हवाओं के कारण जंगलों में आग तेजी से फैलती है. इसी को देखते हुए साल 2026 के फॉरेस्ट फायर सीजन को लेकर भी पहले से आशंका जताई जा रही थी कि इस बार आग की घटनाएं ज्यादा हो सकती हैं. खासकर कम बारिश की स्थिति को देखते हुए जोखिम और बढ़ गया था.

गढ़वाल में हुई वनाग्नि की अधिकतर घटनाएं (Video-ETV Bharat)

इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए वन विभाग ने इस बार पहले से ज्यादा सतर्कता बरती. विभाग ने न केवल संसाधनों को मजबूत किया, बल्कि जमीनी स्तर पर निगरानी भी बढ़ाई. अधिकारियों की तैनाती से लेकर स्थानीय समुदायों की भागीदारी तक कई स्तरों पर तैयारियां की गईं.

इसके बावजूद जब 15 फरवरी से शुरू हुए फॉरेस्ट फायर सीजन के अब तक के आंकड़ों पर नजर डालते हैं, तो तस्वीर राहत देने वाली नजर आती है. राज्य में अब तक कुल 86 वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की गई हैं. इनमें से 4 घटनाएं वन्यजीव क्षेत्रों में हुई हैं, जबकि शेष 82 घटनाएं गढ़वाल मंडल के वन क्षेत्रों में दर्ज की गई हैं.

अगर नुकसान की बात करें तो इन 86 घटनाओं में कुल 45.85 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है. इसमें 3.35 हेक्टेयर क्षेत्र वन्यजीव क्षेत्रों का है, जबकि 42.5 हेक्टेयर क्षेत्र गढ़वाल मंडल के जंगलों का है. आंकड़े साफ बताते हैं कि वनाग्नि का सबसे ज्यादा असर गढ़वाल क्षेत्र में ही देखने को मिला है.

विशेषज्ञों की मानें तो इस बार मार्च महीने में मौसम का बदला हुआ मिजाज वनाग्नि की घटनाओं में कमी का एक बड़ा कारण रहा है. आमतौर पर मार्च में तापमान तेजी से बढ़ता है और जंगल सूखने लगते हैं, जिससे आग लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं. लेकिन इस बार मार्च में समय-समय पर हुई बारिश और नमी ने आग फैलने की संभावनाओं को काफी हद तक कम कर दिया.

वन विभाग के अधिकारियों का भी मानना है कि मौसम ने इस बार बड़ी भूमिका निभाई है, लेकिन इसके साथ-साथ विभाग की सक्रियता भी कम नहीं रही. फील्ड स्तर पर निगरानी बढ़ाई गई, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर वहां विशेष सतर्कता बरती गई और त्वरित कार्रवाई के लिए टीमें तैयार रखी गईं. वन मंत्री सुबोध उनियाल ने भी इस स्थिति पर संतोष जताया है.

मार्च में हुई बारिश ने वनाग्नि की घटनाओं को नियंत्रित करने में मदद की है, लेकिन विभाग ने भी इस बार पहले से ज्यादा सक्रियता दिखाई है. पीसीसीएफ स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों को जिलों में नोडल अधिकारी बनाकर भेजा गया, ताकि स्थानीय स्तर पर बेहतर समन्वय और निगरानी सुनिश्चित की जा सके.
सुबोध उनियाल, वन मंत्री

इसके अलावा वन विभाग ने ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भी इस अभियान से जोड़ा. जंगलों के आसपास रहने वाले समुदायों को जागरूक किया गया और उन्हें आग लगने की स्थिति में तुरंत सूचना देने और शुरुआती स्तर पर नियंत्रण में मदद करने के लिए प्रेरित किया गया. यह रणनीति पहले भी कारगर साबित हुई है और इस बार भी इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं.

हालांकि अभी फॉरेस्ट फायर सीजन खत्म नहीं हुआ है और आने वाले दिनों में तापमान बढ़ने की संभावना बनी हुई है. ऐसे में वन विभाग किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है. विभाग का कहना है कि जैसे-जैसे गर्मी बढ़ेगी, वैसे-वैसे सतर्कता और भी बढ़ाई जाएगी.

अप्रैल और मई महीने वनाग्नि के लिहाज से सबसे संवेदनशील होते हैं. इस दौरान सूखी घास, पत्तियां और तेज हवाएं आग को तेजी से फैलाने में मदद करती हैं. ऐसे में आने वाले समय में चुनौती बढ़ सकती है.

फिलहाल सीजन के शुरुआती डेढ़ महीने के आंकड़े राहत देने वाले जरूर हैं, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है. वन विभाग की तैयारियां और मौसम का साथ अगर इसी तरह बना रहा, तो इस साल वनाग्नि की घटनाओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.

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