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उत्तराखंड में एक कीड़े की वजह से हजारों पेड़ों को काटने की आई नौबत, जानिए क्या है यह मुसीबत


साल के पेड़ों के लिए ‘काल’ बना साल बोरर (फोटो- ETV Bharat)

देहरादून से नवीन उनियाल की रिपोर्ट: उत्तराखंड में हजारों पेड़ों के लिए एक कीट बड़ी समस्या बन गया है. आलम ये है कि इसके कारण बड़ी संख्या में पेड़ों को काटने की नौबत आ गई है. हालांकि, इसके लिए वन विभाग अभी विशेषज्ञों से राय ले रहा है. ताकि, इस समस्या से पूरी तरफ से मुक्ति मिल सके.

दरअसल, देहरादून वन प्रभाग में साल के जंगलों पर एक बार फिर कीटों का गंभीर हमला सामने आया है. होपलो सिरेंबिक्स स्पाइनिकॉर्निस जिसे आम तौर पर ‘साल बोरर’ के नाम से जाना जाता है, इसके लार्वा ने हजारों पेड़ों को भीतर से नुकसान पहुंचाया है. इस स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार ने केंद्र से विशेष अनुमति मांगी है. ताकि, प्रभावित पेड़ों को हटाने और कीट नियंत्रण के लिए व्यापक अभियान चलाया जा सके.

Sal Borer Insect

साल के हरे भरे जंगल (फाइल फोटो- ETV Bharat)

देहरादून में यहां 19,170 पेड़ प्रभावित: वन विभाग की मानें तो देहरादून वन प्रभाग की थानो, आशारोड़ी और झाझरा रेंज में बड़ी संख्या में साल के पेड़ों में इस कीट का प्रकोप पाया गया है. प्रारंभिक जानकारी मिलने के बाद विभाग ने वन अनुसंधान संस्थान (FRI) के वैज्ञानिकों की मदद ली. जिसमें कुल 19,170 पेड़ इस कीट के लार्वा से प्रभावित होना पाए गए.

इन पेड़ों में से कई पूरी तरह सूख चुके हैं. खास तौर पर जिन पेड़ों की ऊपरी छत्र यानी कैनोपी तक सूख चुकी है, उन्हें काटना जरूरी हो गया है. ताकि, संक्रमण और न फैले. वहीं, बाकी पेड़ों को बचाने के लिए मानसून के दौरान ट्री ट्रैप ऑपरेशन चलाया जाएगा.“- सुबोध उनियाल, वन मंत्री, उत्तराखंड

पेड़ों के लिए बेहद खतरनाक है यह कीट: विशेषज्ञ बताते हैं कि यह कीट पेड़ों के लिए बेहद खतरनाक होता है. इसके लार्वा जड़ों में प्रवेश कर तने के भीतर तक सुरंग बना लेते हैं और जाइलम ऊतक को नुकसान पहुंचाते हैं. जाइलम वो हिस्सा होता है, जो जड़ों से पानी और खनिजों को पेड़ के अन्य हिस्सों तक पहुंचाता है. जब यह तंत्र प्रभावित होता है तो पेड़ धीरे-धीरे अंदर से खोखला होकर सूख जाता है.

Sal Borer Insect

पेड़ों को बुरादे में तब्दील कर रहा साल बोरर (फाइल फोटो- ETV Bharat)

वन विभाग चलाता है ‘ट्री ट्रैप’ ऑपरेशन, कीट का किया जाता है खात्मा: इस समस्या से निपटने के लिए वन विभाग ‘ट्री ट्रैप’ ऑपरेशन जैसी पारंपरिक, लेकिन प्रभावी तकनीक अपनाने जा रहा है. इसमें कुछ स्वस्थ साल के पेड़ों को काटकर उनके छोटे-छोटे लठ्ठे बनाए जाते हैं और उन्हें बरसाती पानी में रखा जाता है.

इन लठ्ठों से निकलने वाली गंध कीटों को आकर्षित करती है. जब कीट इन पर आते हैं तो उन्हें पकड़कर नष्ट कर दिया जाता है. यह प्रक्रिया बड़े स्तर पर चलाई जाती है और इसमें स्थानीय महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

Sal Borer Insect

साल बोरर का आतंक (फाइल फोटो- ETV Bharat)

जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में गड़बड़ी का संकेत: पर्यावरण विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर संकेत मान रहे हैं. उनका कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों का प्रभावित होना जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में गड़बड़ी की ओर इशारा करता है.

साल बोरर कीट प्राकृतिक रूप से कठफोड़वा पक्षी का भोजन होता है. जिन क्षेत्रों में कठफोड़वा पर्याप्त संख्या में होते हैं, वहां इस तरह के हमले कम देखने को मिलते है. इससे ये भी संकेत मिलता है कि वन्यजीव संतुलन में कमी आई हो सकती है.

36 साल बाद कीट फिर हुआ सक्रिय: इतिहास पर नजर डालें तो 1990 के दशक की शुरुआत में भी थानो रेंज में इसी तरह का हमला हुआ था. करीब 36 साल बाद इस कीट का दोबारा बड़े पैमाने पर सक्रिय होना कई सवाल खड़े करता है. विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और स्थानीय पारिस्थितिकी में बदलाव इसके पीछे प्रमुख कारण हो सकते हैं.

Sal Borer Insect

क्या है साल बोरर (फोटो- ETV Bharat GFX)

कीट के बढ़ने के ये हो सकते हैं कारण: पिछले साल उत्तराखंड में सामान्य से ज्यादा बारिश दर्ज की गई थी. वैज्ञानिकों का मानना है कि अत्यधिक नमी और बदलते मौसम के पैटर्न ऐसे कीटों के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करते हैं. यही वजह है कि इस बार होपलो का प्रकोप ज्यादा व्यापक रूप में सामने आया है.

वन मंत्री सुबोध उनियाल हुए गंभीर: वन मंत्री सुबोध उनियाल ने भी इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा है कि इसके कारणों और दीर्घकालिक समाधान के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाएगा. उनका मानना है कि केवल प्रभावित पेड़ों को काटना या अस्थायी उपाय अपनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि इसके पीछे के मूल कारणों को समझना जरूरी है.

Sal-Trees in Forests of Uttarakhand

साल के जंगल (फोटो- ETV Bharat)

जैव विविधता के लिए अहम हैं साल के पेड़: देहरादून के साल वन न केवल जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि स्थानीय पर्यावरण संतुलन में भी उनकी अहम भूमिका है. ऐसे में इन पेड़ों को बचाने के लिए समय रहते प्रभावी कदम उठाना बेहद जरूरी हो गया है. ताकि, आने वाले समय में इस तरह की समस्या और विकराल रूप न ले सके.

क्षेत्र में कई जगहों पर कीट का प्रकोप देखा जा रहा है और इसके प्रभाव में कई पेड़ आ चुके हैं, ऐसे में जिन वृक्षों से इन कीटों को नहीं हटाया जा सकता, उन्हें कटाना ही एक मात्र उपाय है. बाकी विशेषज्ञों की राय के आधार पर ही कदम उठाया जाएगा.“- नीरज शर्मा, डीएफओ, देहरादून

साल के पेड़ों की खासियत: बता दें कि पर्यावरण के लिहाज से भी साल के पेड़ काफी अहम माने जाते हैं. क्योंकि, इसके पेड़ ऑक्सीजन देने के साथ ही प्रदूषण को कम करने में मदद करते हैं. साल के पेड़ों से हवा-पानी की गुणवत्ता बेहतर होती है. पेड़ प्रदूषकों को अवशोषित कर कणों को रोकने का काम करते हैं.

Sal Borer Insect

साल के पेड़ का महत्व (फोटो- ETV Bharat GFX)

इसके अलावा पेड़ों से छाया मिलती है और हवा का तापमान कम होता है. बारिश के पानी को अवशोषित कर मिट्टी के कटाव को कम करने में मदद करते हैं. इतना ही नहीं साल का पेड़ छत्तीसगढ़ का राजकीय वृक्ष भी है. साल को जंगली हाथियों और बाघ समेत विभिन्न वन्यजीवों के लिए उनके घर की तरह माना जाता है.

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