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देहरादून: राजधानी देहरादून, जो कभी अपनी शांत फिजा और एजुकेशन हब की पहचान के लिए जानी जाती थी, आज बढ़ती आपराधिक घटनाओं को लेकर चर्चा में है. बीते कुछ महीनों में सामने आई रोड रेज, बार विवाद, दबदबा बनाने और आपसी झगड़ों में छात्रों की बढ़ती संलिप्तता ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. सवाल सिर्फ कानून व्यवस्था पर नहीं, बल्कि पेरेंटिंग, लाइफस्टाइल और सामाजिक माहौल पर भी उठने लगे हैं. आखिर गलती कहां हो रही है?
आपराधिक घटनाओं में युवाओं की भूमिका चिंता का विषय: बीते दिनों देहरादून में एक के बाद एक कई आपराधिक घटनाएं सामने आई हैं, जिन पर पुलिस लगातार सख्त कार्रवाई कर रही है. इन घटनाओं में सबसे बड़ी चिंता उस युवा पीढ़ी को लेकर है, जो यहां पढ़ने के लिए आती है, लेकिन धीरे-धीरे गलत दिशा में जाती नजर आ रही है.
छात्र एंजल चकमा की मौत का मामला हो या जोहड़ी गांव में बार के 40 हजार के बिल से शुरू हुआ विवाद, जो सड़क पर गोलीबारी तक पहुंच गया और जिसमें मॉर्निंग वॉक पर निकले रिटायर्ड ब्रिगेडियर मुकेश जोशी को अपनी जान गंवानी पड़ी. इसके अलावा प्रेमनगर में मुजफ्फरनगर के छात्र दिव्यांशु जटराना की हत्या का मामला भी सामने आया था. इन सभी घटनाओं में एक बात समान रूप से सामने आ रही है, सभी घटनाओं देहरादून के अलग-अलग कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों ने की है. यानी पढ़ाई के लिए आए छात्र अब अपराध की घटनाओं में भी शामिल होते नजर आ रहे हैं, जो भविष्य के लिए गंभीर संकेत है.

देहरादून की शांत वादियों में बढ़ा क्राइम. (ETV Bharat)
एजुकेशन हब की छवि पर दाग, क्षेत्रवाद की भी बढ़ी आंच: एजुकेशन हब के रूप में पहचान रखने वाले देहरादून की छवि पर ये घटनाएं लगातार बट्टा लगाने का काम कर रही हैं. इतना ही नहीं इन घटनाओं ने समाज में क्षेत्रवाद की भावना को भी हवा दी है. जब नॉर्थ ईस्ट के छात्र की हत्या हुई, तो शहर की छवि पर सवाल खड़े हुए. वहीं रिटायर्ड ब्रिगेडियर मुकेश जोशी के हत्याकांड में बाहरी राज्यों से आए छात्रों पर उंगलियां उठने लगीं. इसके बाद जब दिव्यांशु जटराना की हत्या हुई, तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों में आक्रोश देखने को मिला और बड़ी संख्या में लोग देहरादून पहुंचकर विरोध जताने लगे. ये घटनाएं केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गई हैं, बल्कि सामाजिक संतुलन और आपसी विश्वास को भी प्रभावित कर रही हैं.

आखिर देहरादून जैसे शांत इलाके में क्यों हिंसक हो रहे छात्र. (ETV Bharat)
अभिभावकों की भी बड़ी जिम्मेदारी: हर घटना के बाद अक्सर पुलिस पर सवाल उठाए जाते हैं और उसे ही आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन अगर इस समस्या को जड़ से समझने की कोशिश की जाए, तो इसकी वजह कहीं और भी नजर आती है. इस मुद्दे को किसान नेता राकेश टिकैत ने भी उठाया. दिव्यांशु जटराना हत्याकांड के बाद देहरादून पहुंचे टिकैत ने साफ शब्दों में कहा कि अभिभावकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. उन्होंने कहा कि यह बात कड़वी जरूर है, लेकिन बच्चों के भविष्य के लिए जरूरी है.
जिस अभिभावक ने अपने बच्चों को महंगी काली गाड़ी दे दी, उसने 40 प्रतिशत तक उन्हें बिगाड़ दिया. इस तरह की सुविधाएं बच्चों को पढ़ाई से भटकाकर दिखावे और दबंगई की ओर ले जाती हैं. अगर पढ़ाई करनी है, तो सादगी अपनाएं और जरूरत पड़े तो अपनी गाड़ियों का रंग तक बदल लें.
-राकेश टिकैत, किसान नेता-
महंगी गाड़ियां और दिखावे की संस्कृति पर सवाल: राकेश टिकैत ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि पंजाब यूनिवर्सिटी में उनके काफिले की काली SUV को कैंपस में प्रवेश नहीं दिया गया, क्योंकि वहां इस तरह की गाड़ियों पर रोक है. इसी तरह हिमाचल प्रदेश में भी सायरन और दिखावे पर सख्ती देखने को मिलती है. उन्होंने कहा कि जहां पढ़ाई का माहौल होता है, वहां इस तरह का प्रदर्शन स्वीकार्य नहीं होता. लेकिन देहरादून में तेजी से बढ़ती यह दिखावे की संस्कृति युवाओं को गलत दिशा में ले जा रही है, जो आने वाले समय के लिए खतरनाक संकेत है.

पुलिस भी लगातार हिंसक छात्रों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है. (ETV Bharat)
पहले रचनात्मक माहौल, अब निजी प्रदर्शन हावी: देहरादून के प्रतिष्ठित DAV कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और वर्तमान में उच्च शिक्षा उन्नयन समिति के उपाध्यक्ष डॉ. देवेंद्र भसीन ने इस पर अपने विचार रखे है. उनका कहना है कि पहले छात्रों में ऊर्जा और जोश जरूर होता था, जिसका इस्तेमाल रचनात्मक दिशा में होता था. उन्होंने बताया कि
DAV कॉलेज का एक लंबा इतिहास रहा है, जहां छात्र राजनीति के दौरान गुटबाजी और तनाव की स्थिति भी बनती थी, इसके बावजूद एक शैक्षणिक और रचनात्मक माहौल बना रहता था. इसी कॉलेज से कई बड़े नेता, सैन्य अधिकारी और प्रतिष्ठित लोग निकले हैं, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. आज के समय में छात्र पढ़ाई और करियर से ज्यादा ग्लैमर, सोशल स्टेटस और निजी प्रदर्शन पर ध्यान दे रहे हैं, जो अपने आप में चिंता का विषय है.
-डॉ. देवेंद्र भसीन, पूर्व प्राचार्य, DAV कॉलेज देहरादून-
पेरेंट्स की भूमिका अहम, बैकग्राउंड जांच की जरूरत: डॉ. भसीन का मानना है कि जो छात्र बाहर से देहरादून पढ़ने के लिए आते हैं, उनके अभिभावकों को यह समझना होगा कि उनके बच्चे यहां किस उद्देश्य से आए हैं.

त्रिपुरा के छात्र एजल चमका की मौत के बाद भी इसी तरह के सवाल खड़े हुए थे. (ETV Bharat)
क्या बच्चे वास्तव में पढ़ाई कर रहे हैं या सिर्फ डिग्री लेने के नाम पर दूसरी गतिविधियों में शामिल हैं? क्या अभिभावक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके बच्चों को दिया जा रहा पैसा कहां और कैसे खर्च हो रहा है? हाल की घटनाओं में शामिल कई छात्रों के पास महंगी गाड़ियां और पर्याप्त पैसा था, यहां तक कि कुछ मामलों में अवैध हथियार भी मिले हैं. ऐसे में इन छात्रों के बैक ग्राउंड की जांच भी जरूरी हो जाती है.
-डॉ. देवेंद्र भसीन, पूर्व प्राचार्य, DAV कॉलेज देहरादून-
अपराध की जड़ में परिवार का सपोर्ट भी शामिल: देहरादून के SSP अजय सिंह का भी मानना है कि इन घटनाओं में पेरेंटिंग की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उन्होंने हाल की एक घटना का उदाहरण देते हुए बताया कि

उत्तराखंड में बढ़ते क्राइम चिंता का विषय. (ETV Bharat)
आरोपियों ने घटना से पहले रातभर एक बार में 35 से 40 हजार रुपये तक की शराब पी. इसके बाद बिल को लेकर विवाद हुआ और मामला हिंसा में बदल गया. इतनी बड़ी रकम खर्च करना किसी सामान्य परिवार के लिए संभव नहीं है. ऐसे में यह साफ है कि बच्चों को मिल रही अंधाधुंध आर्थिक छूट और निगरानी की कमी भी अपराध की एक बड़ी वजह बन रही है.
-प्रमेंद्र डोबाल, एसएसपी देहरादून-
शिक्षण संस्थानों की भूमिका भी अहम, जवाबदेही तय करने की जरूरत: डॉ. भसीन का कहना है कि इस पूरे मामले में शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 जहां निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की बात करती है, लेकिन शिक्षा के बाजारीकरण का समर्थन नहीं करती. आज के समय में कई संस्थानों का ध्यान शिक्षा से ज्यादा व्यवसाय और ग्लैमर पर केंद्रित होता जा रहा है.
कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का मूल्यांकन अब उनके शैक्षणिक परिणामों से ज्यादा वहां होने वाले कार्यक्रमों और दिखावे से किया जा रहा है. इसके अलावा एजेंट्स के माध्यम से एडमिशन कराने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है, जो गंभीर चिंता का विषय है. ऐसे में जरूरी है कि संस्थान यह सुनिश्चित करें कि छात्र नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित रहें और छात्रावासों में भी अनुशासन बना रहे.
-डॉ. देवेंद्र भसीन, पूर्व प्राचार्य, DAV कॉलेज देहरादून-
समाज, परिवार और सिस्टम की परीक्षा: देहरादून में बढ़ती आपराधिक घटनाएं केवल कानून व्यवस्था की चुनौती नहीं हैं, बल्कि यह समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था तीनों के लिए एक चेतावनी है. अगर समय रहते पेरेंटिंग में सुधार नहीं हुआ, शिक्षा संस्थानों ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई और युवाओं ने अपनी प्राथमिकताओं को नहीं बदला, तो एजुकेशन हब की पहचान रखने वाला यह शहर अपराध की नई पहचान बन सकता है. अब सवाल यह है कि जिम्मेदारी कौन लेगा पुलिस, परिवार या पूरा समाज?
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