नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को शंघाई सहयोग परिषद (SCO) के राष्ट्राध्यक्षों की 25वीं बैठक से इतर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की. इस दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने रविवार को अच्छे भारत-चीन संबंधों के महत्व पर प्रकाश डाला.
इतना ही नहीं पीएम मोदी ने 2026 में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भी आमंत्रित किया.विदेश मंत्रालय की एक प्रेस रिलीज के अनुसार चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने निमंत्रण के लिए प्रधानमंत्री मोदी का धन्यवाद कहा है.
बता दें कि एससीओ 10 सदस्य देशों का एक यूरेशियन राजनीतिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संगठन है. इसकी स्थापना 2001 में चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान द्वारा की गई थी.
जून 2017 में इसका विस्तार भारत और पाकिस्तान सहित आठ देशों तक हो गया. ईरान जुलाई 2023 में और बेलारूस जुलाई 2024 में इस समूह में शामिल हुआ. इसके बाद कई और देश ओब्जर्वर या संवाद भागीदार के रूप में इसमें शामिल हुए.
भौगोलिक विस्तार और जनसंख्या की दृष्टि से यह दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन है, जो विश्व के कुल क्षेत्रफल का लगभग 24 प्रतिशत (यूरेशिया का 65 प्रतिशत) और विश्व की 42 प्रतिशत जनसंख्या को कवर करता है. 2024 तक इसकी ज्वाइंट ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्शन (GDP) लगभग 23 प्रतिशत थी.
बीजिंग पिछले कुछ वर्षों से बड़े पैमाने पर एससीओ नेताओं की बैठक की मेजबानी कर रहा है, साथ ही यह तियानजिन का उपयोग पूरे यूरेशिया में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए कर रहा है. इससे इस बात पर और अधिक ध्यान जाता है कि चीन की अध्यक्षता वाली इस प्रक्रिया में भारत खुद को कैसे स्थापित करता है और कितनी कुशलता से प्रतिस्पर्धा और सहभागिता के बीच संतुलन बनाता है.
भारत से सीमा पार आतंकवाद की स्पष्ट निंदा करने की अपेक्षा की जाती है, न कि केवल आतंकवाद, अलगाववाद और धार्मिक अतिवाद का सामान्य उल्लेख करने की. दिल्ली ने 2023 में एससीओ अध्यक्ष के रूप में पहले भी ऐसा किया है और तियानजिन के परिणाम दस्तावेजों में उस मानक को बनाए रखने या मजबूत करने का प्रयास करेगा.
यहां यह उल्लेखनीय है कि इस साल जून में चीन के क़िंगदाओ में आयोजित एससीओ रक्षा मंत्रियों की बैठक के बाद भारत ने परिणाम दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, क्योंकि उसमें पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हुए आतंकवादी हमलों का जिक्र था, जबकि पहलगाम आतंकवादी हमले का कोई ज़िक्र नहीं था.
आतंकवाद का मुकाबला एससीओ का एक प्रमुख एजेंडा है. क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना (आरएटीएस) एससीओ का एक स्थायी अंग है, जो आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद से निपटने के लिए सदस्य देशों के बीच सहयोग को सुगम बनाता है.
उज्बेकिस्तान के ताशकंद में स्थित एससीओ-आरएटीएस खुफिया जानकारी साझा करने, आतंकवाद-रोधी प्रयासों में समन्वय स्थापित करने, आतंकवाद, अलगाववाद, धार्मिक अतिवाद और मादक पदार्थों की तस्करी और हथियारों की तस्करी जैसे संबंधित मुद्दों से निपटकर क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने का काम करता है.
इस सप्ताह के शुरू में मोदी के भारत से रवाना होने से पहले यहां एक विशेष मीडिया ब्रीफिंग के दौरान विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) तन्मय लाल ने कहा था कि एससीओ की स्थापना आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद जैसी बुराइयों का मुकाबला करने के प्राथमिक लक्ष्य के साथ की गई थी, जो अभी भी एक चुनौती बनी हुई हैं.
लाल ने कहा, “2023 में भारत की अध्यक्षता के दौरान एससीओ ने अलगाववाद, उग्रवाद और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले कट्टरपंथ का मुकाबला करने में सहयोग पर एक संयुक्त वक्तव्य अपनाया था.”
उन्होंने कहा कि भारत ने 2021-2022 के दौरान एससीओ रैट्स परिषद की अध्यक्षता की थी. उन्होंने यह भी बताया कि इस साल फरवरी में एससीओ रैट्स के महासचिव, नूरलान येरमेकबायेव, जो कजाकिस्तान के पूर्व मंत्री हैं ने भारत का दौरा किया था और उपयोगी चर्चाएं की थीं.
उन्होंने आगे कहा, “हम अन्य सदस्यों और साझेदारों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहे हैं कि सीमा पार आतंकवाद सहित आतंकवाद की कड़ी निंदा दोहराई जाए.”
काउंटर टेररिज्म के अलावा शिखर सम्मेलन के संयुक्त घोषणापत्र में भारत की अन्य सीमाओं में चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) से जुड़े उन पाठों का समर्थन न करना शामिल हो सकता है जो विवादित क्षेत्रों को छूते हैं या किसी तीसरे देश के गलियारे के दावों को स्वीकार करते हैं.
यह एससीओ शिखर सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विभिन्न देशों पर टैरिफ लगाए हैं और एससीओ सदस्य देशों में भारत इनसे सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ है.
ट्रंप के टैरिफ एजेंडे ने हाई टैरिफ लगाए हैं और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ-साथ विदेशों में कानूनी और कूटनीतिक प्रतिरोध को जन्म दिया है. यह आर्थिक पृष्ठभूमि को और जटिल बना देता है जिसके तहत एससीओ की बैठकें होती हैं. अमेरिका द्वारा अचानक और बड़े टैरिफ लगाने से व्यापार प्रवाह बाधित हुआ है.
हाई टैरिफ के कारण देशों को सप्लाई चैन पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा है और वैकल्पिक भुगतान, स्थानीय मुद्रा समझौतों और नए व्यापार गलियारों पर बातचीत को बढ़ावा मिला है.
भारत के लिए, ये टैरिफ दोहरे रणनीतिक फैक्टर हैं. ये बाजारों में विविधता लाने और क्षेत्रीय आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की तात्कालिकता को बढ़ाते हैं, साथ ही समान विचारधारा वाले एससीओ सदस्यों के लिए व्यापार और भुगतान संबंधी पहलों को तलाशने के लिए प्रोत्साहन भी पैदा करते हैं, जो अमेरिका के नेतृत्व वाले आर्थिक साधनों के जोखिम को कम करते हैं. इसलिए, नई दिल्ली तियानजिन शिखर सम्मेलन को व्यावहारिक आर्थिक सहयोग पर जोर देने के एक ऐसे मंच के रूप में देख रहा है जो सदस्य अर्थव्यवस्थाओं को बाहरी झटकों से बचाए.
किंग्स कॉलेज लंदन में किंग्स इंडिया इंस्टीट्यूट में इंटरनेशनल रिलेशन के प्रोफेसर और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन थिंक टैंक में उपाध्यक्ष हर्ष वी पंत ने ईटीवी भारत को बताया, “तीन बड़े देश एक ही समय में चीन में एक साथ आएंगे. ट्रंप के टैरिफ के संदर्भ में यह शिखर सम्मेलन में काफी दिलचस्प है.”
हालांकि, पंत ने बताया कि एससीओ का मुख्य एजेंडा आतंकवाद का मुकाबला करना है और इस मोर्चे पर यह अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहा है. उन्होंने कहा, “चीन की मदद से पाकिस्तान आतंकवाद के मुद्दे को कमजोर कर रहा है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अंतिम बयान कैसा होता है. यह चीन की कूटनीतिक रणनीति की परीक्षा होगी.”
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