देवभूमि में पलायन के दर्द से कराहते गांव (Photo-ETV Bharat)
नैनीताल: सरकारें भले ही ‘रिवर्स पलायन’ और गांवों को पर्यटन से जोड़ने के दावे कर रही हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. नैनीताल जिले के धारी ब्लॉक का गाड़ियूड़ा गांव आज पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुका है. कभी 500 से अधिक परिवारों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाला यह गांव अब सन्नाटे में डूबा हुआ है. टूटी छतें, जर्जर दीवारें और बंद दरवाजों पर लटकते ताले इस गांव के उजड़ने की कहानी खुद बयां करते हैं.
बुजुर्ग कर रहे अपनों के गांव लौटने का इंतजार: गांव की पगडंडियों से जो लोग रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर गए, वे फिर कभी लौटकर नहीं आए. आज हालात यह हैं कि गांव की आबादी घटकर महज 35 लोगों तक सिमट गई है, जिनमें ज्यादातर बुजुर्ग हैं. सूने रास्तों पर बैठकर ये बुजुर्ग आज भी अपनों के लौटने का इंतजार करते नजर आते हैं.

गांव में तेजी से बढ़ा पलायन (Photo-ETV Bharat)
10 साल में उजड़ गया पूरा गांव: पिछले एक दशक में गाड़ियूड़ा गांव से तेजी से पलायन हुआ है. रोजगार के सीमित साधन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने लोगों को गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया. गांव के मरीजों को इलाज के लिए 110 किलोमीटर दूर हल्द्वानी या 60 किलोमीटर दूर पहाड़पानी और पदमपुरी जाना पड़ता है. ऐसे में आपात स्थिति में कई बार जान पर बन आती है.
शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी बनी बड़ी वजह: गांव में बेहतर स्कूल न होने के कारण परिवार अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए शहरों की ओर पलायन कर गए. कुछ बच्चे आज भी कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते हैं, लेकिन अधिकांश परिवार स्थायी रूप से गांव छोड़ चुके हैं. गांव के आसपास रोजगार की बेहतर व्यवस्था और बेहतर स्वास्थ्य सेवा न होने के चलते भी अब गांव में तेजी से पलायन हो गया है.

गाड़ियूड़ा गांव में छाई वीरानी (Photo-ETV Bharat)
खेती-किसानी भी हुई चौपट: एक समय गाड़ियूड़ा गांव सब्जी और दुग्ध उत्पादन के लिए जाना जाता था. यहां के किसान आलू, मटर, टमाटर, शिमला मिर्च और गडेरी की खेती कर शेरों की बड़ी मंडी में भेजा करते थे जिससे किसानों को अच्छी आय अर्जित होती थी लेकिन बीते कुछ वर्षों में जंगली सूअर और बंदरों के बढ़ते आतंक ने खेती को बर्बाद कर दिया. ग्रामीणों का कहना है कि फसलें लगातार नष्ट होने के कारण उन्होंने खेती और पशुपालन से दूरी बना ली है. मौसम की मार ने भी किसानों की कमर तोड़ दी है.
5 किमी पैदल, तब बनेगी सड़क: गांव तक आज भी सड़क नहीं पहुंची है. ग्रामीणों को करीब 5 किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक पहुंचना पड़ता है. इससे मरीजों, बुजुर्गों और किसानों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. हालांकि अब सड़क निर्माण को स्वीकृति मिल चुकी है, लेकिन गांव के बुजुर्गों की पीड़ा इस एक वाक्य में साफ झलकती है कि सड़क पहले आएगी या सांस पहले छूट जाएगी, पता नहीं?

रखरखाव के अभाव में खंडहर हुए मकान (Photo-ETV Bharat)
सड़क को लेकर ग्रामीणों का दर्द: ग्रामीण प्रकाश जोशी कहते हैं कि जंगली जानवरों और मौसम की मार से खेती करना मुश्किल हो गया है, जिससे युवाओं को रोजगार के लिए शहरों की ओर जाना पड़ रहा है. वहीं त्रिलोचन जोशी का कहना है कि शिक्षा और रोजगार की कमी ने गांव को खाली कर दिया है, सरकार को पलायन रोकने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए.

गांव के रास्तों में उगी घास (Photo-ETV Bharat)
पलायन पर क्या बोले जिम्मेदार: गांव में पलायन को लेकर एसडीएम धारी अंशुल भट्ट का कहना है कि गांवों में सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है. हालांकि पलायन रोकने के लिए अलग से कोई विशेष योजना फिलहाल नहीं है, लेकिन युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने और सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं.
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