धराली आपदा की असली वजह (फोटो- WIHG Scientist Swapnamita Choudhury)
धीरज सजवाण
देहरादून (उत्तराखंड): उत्तरकाशी जिले के धराली में 5 अगस्त 2025 को आई भीषण आपदा ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था. हिमालय की विषम भौगोलिक परिस्थितियों और यहां पर प्राकृतिक आपदाओं के बदलते स्वरूप को लेकर हर कोई जानना चाहता था कि आखिर यह हादसा कैसे हुआ? उसके पीछे कारण क्या थे? घटना के बाद कई तरह की बातें सामने आई. शुरुआती शोधकर्ताओं के बयानों में सामने आया कि ग्लेशियर के किसी बड़े हिस्से के टूटने की वजह से यह आपदा आई, जिसमें ग्लेशियर डिपॉजिट और मोरेन ने नीचे घाटी में एक खतरनाक बाढ़ का रूप ले लिया.
वहीं, कुछ लोगों ने इसे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड भी बताया तो कुछ लोगों ने इसे केवल भूस्खलन और अन्य कारणों की वजह से आई आपदा करार दिया, लेकिन किसी भी शोधकर्ता के बयान में यह स्पष्ट नहीं हो पाया था कि आखिर यह घटना कैसे हुई? अब तक किसी ने भी इस बात पर जोर नहीं दिया कि वहां पर तेज बारिश होती है. क्योंकि, आपदा प्रबंधन की ओर जारी किए गए अलर्ट में उत्तर में भारी बारिश नहीं दिख रही थी. पारंपरिक तौर से भी उच्च ग्लेशियर इलाके में तेज बारिश नहीं हुआ करती है.
जियोलॉजिस्ट डॉ. स्वप्नमिता चौधरी ने बताई धराली आपदा की असली वजह (वीडियो- Swapnamita Choudhury/ETV Bharat)
वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट डॉ. स्वप्नमिता चौधरी ने किए कई खुलासे: बरहाल, देहरादून में चल रहे विश्व आपदा प्रबंधन सम्मेलन में उत्तराखंड स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी (UCOST) की ओर से किए गए धराली आपदा पर शोध का प्रेजेंटेशन दिया गया. इस प्रेजेंटेशन को वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट डॉ. स्वप्नमिता चौधरी (Swapnamita Vaideswaran) ने साझा किया. धराली आपदा पर यह शोध भी उनकी ही ओर से की गई थी.

जल सैलाब से पहले ऐसा दिखता था धराली (फाइल फोटो- Local Resident)
खीर गंगा में आए सैलाब के पीछे की असली वजह तेज बारिश: जियोलॉजिस्ट स्वप्नमिता चौधरी ने अपनी प्रेजेंटेशन में बताया कि 5 अगस्त को धराली के ऊपर खीर गंगा में आई बाढ़ के पीछे की असल वजह तेज बारिश ही है. सुनने में थोड़ा सा अजीब जरूर लगेगा, लेकिन डॉक्टर स्वप्नमिता चौधरी ने इसके कुछ तथ्यात्मक प्रमाण और कुछ फोटोग्राफ्स भी अपनी प्रेजेंटेशन में साझा किए.
उन्होंने इस बात को स्वीकारा कि ट्रेडिशनल तौर पर हम यह मान कर चलते हैं कि हाई एल्टीट्यूड यानी ग्लेशियर वाले इलाकों में तेज बारिश नहीं होती है. बल्कि, वहां पर हल्की ड्रेजिंग यानी बहुत हल्की छनकर होने वाली बारिश होती है. इससे कहा जा सकता है कि अब हिमालय की इकोलॉजी बदल रही है, जो कि क्लाइमेट चेंज की वजह से हो रहा है.

5 अगस्त 2025 के दिन धराली में आई आपदा (फाइल फोटो- Local Resident)
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एपिसेंटर पर शोध कर लौट चुकी स्वप्नमिता चौधरी: इतना ही नहीं डॉक्टर स्वप्नमिता चौधरी ने धराली से ऊपर खीर गंगा जहां से शुरू होती है, वहां के कुछ फोटोग्राफ भी साझा किए. जहां पर भारी बारिश के प्रमाण साफतौर पर देखे जा सकते थे. प्रेजेंटेशन के बाद उन्होंने अपने इस शोध के बारे में अहम जानकारी भी दी. उन्होंने बताया कि यूकास्ट की ओर से उन्हें शोध करने के लिए पत्र भेजा गया था. घटना के चौथे दिन वो मौके पर पहुंच गए थे.

आपदा के दौरान धराली का नजारा (फाइल फोटो- Local Resident)
उन्होंने कहा कि उनका शोध सटीक और महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि उनके साथ एसडीआरएफ, आर्मी के अलावा लोकल सपोर्ट काफी अच्छा था. उन्होंने आपदा के एपिसेंटर पर जाकर अपना शोध किया. उन्होंने कहा कि उनकी ओर से आपदाग्रस्त पूरे इलाके को जाना गया. वहां पर सभी तरह के सबूत व जानकारियां जुटाए गए और आपदा के चार दिन के भीतर ही उन्होंने अपनी पूरी ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन (शोध) पूरी कर ली थी.

धराली में आपदा के बाद का नजारा (फाइल फोटो- Local Resident)
“जिस जगह से आपदा शुरू हुई थी, वहां पर बहुत तेज बारिश हुई थी. इसके प्रमाण मुझे वहां पर मिले. यह बहुत छोटे इलाके में हुई बहुत तेज बारिश थी. जिसने एक छोटे से इलाके को प्रभावित किया. यही तेज बारिश इस आपदा को ट्रिगर करने की वजह थी. यहां पर तेज बारिश होने के पीछे की वजह क्लाइमेट चेंज है. इस आपदा को और ज्यादा विध्वंसक बनाने में वहां पर मौजूद मोरेन या फिर डेड आइस का हाथ है. जिसने आपदा लाने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई, जो कि सैटेलाइट डाटा के साथ ग्राउंड पर की गई इन्वेस्टिगेशन में भी सामने आया.“- स्वप्नमिता चौधरी, वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान
धराली आपदा में बारिश का बड़ा योगदान: वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट डॉ. स्वप्नमिता चौधरी ने आगे ये भी बताया कि आपदा की वजह सिर्फ मोरेन और डेड आइस नहीं थी, बल्कि उस दिन काफी ज्यादा बारिश हुई थी. जो आगे जाकर मिट्टी, मलबा आदि बहा ले गया, जो सैलाब के रूप में सामने आया.

वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट डॉ. स्वप्नमिता चौधरी ने साझा किए तस्वीर (फोटो- WIHG Scientist Swapnamita Choudhury)
“केवल यहां मोरेन और डेड आइस ही इस आपदा के पीछे नहीं वजह है, बल्कि ऊपर जो बहुत ज्यादा मात्रा में बारिश हुई थी. उसके बाद जो संकरी घाटी में पहले से ही कई छोटे-छोटे तालाब बने हुए थे, उसके पानी से इस बाढ़ को और ज्यादा आवेग मिला. जिससे यहां तेज आवेग वाली बाढ़ से संकरी घाटी के दोनों तरफ भूस्खलन हुए. जैसे-जैसे पानी बढ़ा, वैसे-वैसे आगे जाकर इसमें मिट्टी और मलबा बढ़ता गया. जो इस बाढ़ का हिस्सा बन गया. जिससे नीचे धराली में तबाही मची.“- स्वप्नमिता चौधरी, वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान
आपदा प्रबंधन के डाटा में बारिश कम रिकॉर्ड, डॉ. स्वप्नमिता चौधरी ने किया ये खुलासा: वहीं, जब उनसे पूछा गया कि आपदा प्रबंधन की ओर से जारी किए गए डाटा में तो उत्तर में बारिश बहुत कम बताया गया था. इस पर डॉ. स्वप्नमिता चौधरी ने बताया कि हमारे वेदर स्टेशन नीचे घाटी में लगे हुए हैं, जिनमें ऊपर ग्लेशियर के पास हुई इस तेज बारिश का डाटा रिकॉर्ड नहीं हुआ.

धराली का प्रभावित क्षेत्र (फोटो सोर्स- Google Earth)
ऊपर हाई एल्टीट्यूड में कोई वेदर स्टेशन नहीं था. जिसकी वजह से वहां हुई बारिश का डाटा हमें नहीं मिल पाया, लेकिन जब ग्राउंड जीरो पहुंचे तो वहां पर भारी बारिश के प्रमाण देखने को मिले. उससे साफ पता चलता है कि वहां पर बहुत तेज बारिश हुई थी. इतना ही नहीं ऊपर हाई एल्टीट्यूड में मौजूद भेड़ पालकों ने भी वहां पर तेज बारिश होने की पुष्टि की.

स्वप्नमिता चौधरी ने प्रेजेंटेशन में दिखाए फोटोग्राफ (फोटो- WIHG Scientist Swapnamita Choudhury)
5 अगस्त को आया था भयानक जल सैलाब: गौर हो कि 5 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी जिले के धराली में खीर गंगा गाड़ में भयानक जल सैलाब आ गया था. जिसने पल भर में सबको मिट्टी में मिला दिया था. इस सैलाब में कई लोग मलबे में दब गए. बरसों की मेहनत की कमाई से बनाए गए तमाम मकान, होटल, होमस्टे पल भर में तबाह हो गए. आज भी कई लोग लापता हैं, जिनकी तलाश जारी है.
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